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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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मेरे बारे में




नाम- महेन्द्र सिंह राणा,
उपनाम- आजाद,
रुचि- लेखन और घूमना,
भाषाई ज्ञान- गढ़वाली, कुमाऊनी, हिन्दी और अँग्रेजी,

देव भूमी उत्तराखण्ड़ मेँ केदारखण्ड़ (गढ़वाल) के बौद्धाँचल (बधाँण) पट्टी मेँ सोल क्षेत्र के डुँग्री गाँव मेँ उन्नीस सौ अट्ठासी मेँ चैत्र माह के सत्रह गते को श्रीमती बिन्दी देवी और श्री बलवन्त सिँह राणा के घर मेँ मेरा जन्म हुआ और माँ व पिताजी के लाड़-प्यार से मेरा नाम महेन्द्र रखा, अपने विचारोँ व स्वतंत्र उद्गारो के चलते मेने अपने नाम के साथ ‘आजाद’ जोड़ दिया।

गढ़वाली मे शुरुआत- गढ़वाली मे लिखने की शुरुआत ०५ फरबरी २००६ को माँ गंगा के तट और भगवान विश्वनाथ की नगरी पवित्र तीर्थ स्थल उत्तरकाशी मे गढ़वाली कविता ‘उड़ जै रे पंछी’ से हुई। और गढ़वाली भाषा और उत्तराखंडी संस्कृति को समर्पित ब्लॉग गढ़वाली कविता !!!की शुरुआत नवम्बर २०११ मे हुई।

हिन्दी मे शुरुआत- हिन्दी मे लिखने की शुरुआत दसवीं से २००३ को हिमालय की गोद मे बसे अपने गाँव सोल डुंग्री मे हिन्दी कविता ‘क्यों सावन भली’ से हुयी। और हिन्दी को समर्पित ब्लॉग "मन-मति" पर

लगातार लेखन जारी है।

वक्त बदलते गया मैँ भी बदलता गया,
कुछ वक्त ने भुला दिया कुछ मुझे भुलना पड़ा,
बहुत कुछ सिखाया वक्त ने
बस पहले से बेहतर हूँ और हमेशा यही कामना करता हूँ…….!!!

(महेन्द्र सिंह राणा ‘आजाद’)