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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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रविवार, 14 जुलाई 2013

ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन


दूर डालिम बैठिक एक पंछी गीत लगान्दी
इनी भौंर पुर्याणी कि-
ऐ! मनखी, क्ख गै मंख्यात
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

कें-कैकुक सुख छीनी
घरबार उजाड़ी त्वेन
अप्णौंक त ल्वै चुसी-चुसी
पर मेरु घ्वोल भी उजाड़ी त्वेन
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

ड़ाsआ का ड़ाsआ काटी
बड़ा-बड़ा उड्यार बनाई त्वेन
गंगा-जमुनाक धार रोकी
बौsगण त छें च त्वेन
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

गारु-माटु भी नि छोड़ी
अप्णौ फांचू भरी त्वेन
लूटी द्वि हाथोंन, अर
आज कुsड़ी बगाई त्वेन
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

बौणा-का-बौण हथियाई
आफु तें खोदी त्वेन
उल्टी गंगा बगै कै
आफु तें डुबाई त्वेन
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
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