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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

"गढ़वाली कविता - नयी स्वाचो"


"बगत बितती रैन
मनखी बदली गैन
नौऊँ त खूब छाई
पर अब काम निरपट ह्वैन
अब भी भरोसू
करूँ त क्नक्वै
यि काबिल क्वै मिलदा ही नि
या इनि बोलू कि
यि काबिल इनोन अफू ते नि छोड़ी
जरा सुणा 'जनपथ' मा सब अपणा हून्दन
अपणा ही हून्दन,
दूसरौ का दगड़ा नि रन्दीन
अफू मा हि रेन्दा
अपणी ही सोचदा
अफू ही खान्दा अर इतदा खान्दा कि
क्टयै भी नि लग्दू इन मास्तो तें
विश्वास त नि रैन
अब बगत भी ऐगै
छ्वाड़ो यु तें अर स्वाचो नयी
नई व्यवस्था ही कुछ फेरबदल कर सकदी
अर द्यै सकदी समाज तें नयु आमाम
त किले ना कि हम एक ह्वै कै
एक नई शुरुआत करुला।"

© सर्वाधिकार सुरक्षित
महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

रविवार, 14 जुलाई 2013

ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन


दूर डालिम बैठिक एक पंछी गीत लगान्दी
इनी भौंर पुर्याणी कि-
ऐ! मनखी, क्ख गै मंख्यात
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

कें-कैकुक सुख छीनी
घरबार उजाड़ी त्वेन
अप्णौंक त ल्वै चुसी-चुसी
पर मेरु घ्वोल भी उजाड़ी त्वेन
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

ड़ाsआ का ड़ाsआ काटी
बड़ा-बड़ा उड्यार बनाई त्वेन
गंगा-जमुनाक धार रोकी
बौsगण त छें च त्वेन
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

गारु-माटु भी नि छोड़ी
अप्णौ फांचू भरी त्वेन
लूटी द्वि हाथोंन, अर
आज कुsड़ी बगाई त्वेन
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

बौणा-का-बौण हथियाई
आफु तें खोदी त्वेन
उल्टी गंगा बगै कै
आफु तें डुबाई त्वेन
ऐ! मनखी, क्या कमाई त्वेन।

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©सर्वाधिकार सुरक्षित

नि ज्याणी !



नि ज्याणी
कऽति ह्यूँद, चौमास
रुड़ियोँ का दिन
अर बरखा-बत्वैणी
उमस्यैऽड़ी रात
त्यारा औणऽक जग्वालऽम्‌ काटी मिन
पर आज
द्वि घड़ी
बिन त्यारा बौड़ऽये सि जाँदू !
यू त्यारु मिलणू कु असर च या
मेरु मन कु भरऽम
पर बात क्वी भी हो
त्वै दगड़ा रै के
छपछपी सि पड़ी जाँदी
त्वै बगैर अब
बिन पाणीक माऽछु जनी तड़पी जाँदु !

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©सर्वाधिकार सुरक्षित