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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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रविवार, 15 जुलाई 2012

जौगी-च्यला अर पाणी कु भकार !


 "सुणा भै-बन्दोँ
 अब जौगी भी
 चिमटा छंणके के
 कैलास पौँछी गै
 दगड़ मा रुण्दारु ले के

 जौगी आधु गढ़देश कु राजा
 सब्युं मा रुंण्ण वालु दरबेरी
 सुणी मिन की
 यूँ देबदेश मा
 'पाणी कु भकार' धना छन

 अब कु बतालु कि
 डाम हमु तेँ ना
 इनु ते चैणी
 वु भी कपाली मा

 बल बुना युँ कि
 हम बिकास छ कना
 ना.. ना.. ना..
 यूँ त मालदार दगड़ी
 अफणी फाँची बांधणा

 जब जौगी ही
 माया की बात करलु
 त वु अफी ही खालु ना
 रुवै रुवै कै
 भिक्षा माँगण व्लु भी
 सपु ते रुवालु कि ना

 हे शिव जरा
 योँ कि कपाली मा
 एक चड़चड़ु डाम धरा द
 इनारी अकल मा
 जरा सी खारु लगावा द

 जरा बतावा कि
 डैम ही बिकास नि छ
 अर डैम हमारु काम कु नि छ
 हमु ते बिजली चैणी
 पाणी कु भकार से
 हमुन क्या कन।"

 महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©
सर्वाधिकार सुरक्षित
Date- १५/०७/२०१२