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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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मंगलवार, 12 जून 2012

त्वेन पहाड़ों मा हि रौण


"वखि रौण भुल्ला
उंदारियों मा नि औण
लुकारों की सिख-सौर
कबारी भी नि कौण,

जब चलि जान्दा क्वै छोड़ी के
लौटिक नि आन्दा
जू क्वै आला भी, द्वि दिन
व्वेन ख्न्योर बणि के रौण,

भौत मनै सपु तें
सब अप्णि हि बिप्दौ मा रे
अब पहाड़ो मा हि रै के
अप्णि सोच बढ़ौण,

नि सोचण कि म्यार सभि
बिराँणु मा चलि गेयाँ
अब गढ़देश तेरु च
त्वेन हि खाण सारु नौण,

नि कण लुगौं कि हथ-जुड़ै
य त पहाड़ों कि अकड़ च
अपणा पहाड़ों तें 'आदर्श' बनौण
भुल्ला त्वेन पहाड़ों मा हि रौण।"


(ख्न्योर- मेहमान, नौण- मक्खन)
महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
© सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक – १३/०६/२०१२