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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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शनिवार, 26 मई 2012

चखुली जनी माया


"धार-चौबाटा 
सैरा-सौपाटा 
ढ़ैऽपुरी-धुरपाऽड़ा 
गोँ-गोँऽळा-गोरबाटा 
बऽणौँ-बुज्याऽणा 
छानियुँ कोल्यणा
म्येरी चखुली जनी माया 
वीं तेँ खुज्याणी रे
सेरा गौँ
म्यारा नौ कु पिछाड़ी 
बौड़्या लगाणी रे
रात त सदनि आन्द पर 
'आजाद' तेँ जून नि दिखे !"


महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
© सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - २३/०५/२०१

रविवार, 20 मई 2012

मिते माफ़ करी द्याई


पाली-पोषी जौन, ज्वान बनायी
हे! दिदा मिन ऊनु तें,
बुड्या छन मा छोड्यली...

हाथ पकड़ी जौन, मेरी खुट्यो ते समाड़ी
हे! काका मिन ऊनैर,
खुशियोंक टांग टोड्यली...

पढ़े-लिखे जौन, आज काबिल बनायी
हे! बौड़ा मि ऊनु ते,
आज कनके बिसरी ज्ञायी

कभी माया कु लोभ, कभी सुखों का बाना
हे! माँजी लाडु तेरो,
बाटु बिरडी ज्ञायी...

रिटी-रिटिक सैरी पिरथी, जब याद घौर आई
हे! बाबा अब ता,
आजाद गढ़देश फ़र्गी ज्ञायी...

लाडु छौं मि तुमारो, गलती ह्वे ज्ञायी
हे! ब्वै-बाबा मेरा,
मिते माफ करी द्याई...
               
(घौर- घर, फ़र्गी- वापस लौटना)
महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
© सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - १९/०५/२०१२
 


सोमवार, 7 मई 2012

सुपन्यु मा


"क्वी सुपन्यु मा
ऐ के
सिराणा पे बैठी के
मेरी कन्दुड़यु मा
कुछ बच्यै गै
इनु लगी की
क्वी गीत गुनगुनै गै 

गीत चौमासु मे
माया का
गीत बण-बुग्याड़ु मे
हौँस उलार का
गाड़-गधन्यु मे
बगदी उमाड़ का
क्वी गीत गुनगुनै गै

बथौँ सी बणी के
चखुली दगड़
फुर्र-फुर्र
असमान मा उड़ी गै
झट निन्द भी उड़ी त
डिसाण मा बे भुवाँ पौड़्यू रै
क्वी गीत गुनगुनै गै।"



हेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
 © सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - ०७/०५/२०१२