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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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बुधवार, 18 अप्रैल 2012

"परदेशी नि गढ़देशी छों मी"





अपणों कु ठुकरायु
जमाणु कु गुनेगार छों मी
सेरा जागा मा न ही सही
अपना घोर मा खास छों मी॥१॥

रुवे-रुवे के कटदा म्यारा दिन
सुपनियों मा भी रट्ट लगी रेंदि
दूर जै के गढ़देश बिटि
ब्वे-बाबु की आस छों मी॥२॥

माँ कु लाड़-दुलार
फटकार बाबाक सुभै-सुभै
दीदी-भूलियों दगड़ लड़े-झगड़
दादी बिना उदास छों मी॥३॥

जों दगड़ पढ़ी-खेली
गोरू चराया छुट्टियो मा
दगरियोंक समुण सिरांणा रेंदी
बिन उनारा निराश छों मी॥४॥

थोड्या-मेलो की रंगत
क्ख सुणेली घुघुतिक घूर-घूर
कन होली म्यार घोर मा रोनक
ये सोची की हताश छों मी॥५॥

ढ़ोल-दमों कु घम्घ्याट
अर प्वोथिलों की चकच्याट
ज्यू नि लग्दु जब तुमार बिना
गढ़-गीतो का पास रौं मी॥६॥

इनी लिखयु होलु म्यार कपाल मा
की रे मी गढ़देश से दूर
भै-बन्धों माफ करिया मिते
परदेशी नि गढ़देशी छों मी॥७॥


महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
 © सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - १७/०४/२०१२