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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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सोमवार, 16 अप्रैल 2012

“बिपदा ढोल्यारों की”


"व्वेन कसी के ढ़ोल
थाप पे थाप लगाई
ताल पे ताल मिले के
ज्यू भौरी के नचाई॥१॥

हेंसदु रे वा
लुके के सारा दर्द
बजाणु रे वा
दिखे के अप्णु फर्ज॥२॥

हमेश यनि बोली व्वेन
बाप-दादा बिटि सेवा करी ठाकुरो
हमुन क्या बोली वे तें कि
तू दास छों हमारों॥३॥

अरे! व्वें कि जिकुडी मा भी
कतक्या पीड़ होन्दी होली
बजे के ताउम्र ढ़ोल
जब नि भोरी वें कि झोली॥४॥

एक कान्धु टांगी के फांचू
दूसरा मा लटके के ढ़ोल
नापि व्वेन गौं-धार-कुड़ा
अर मंगड़ू रे अप्णु मोल॥५॥

डाँका लगी हाथयूं मा
ढ़ोल-दमों बजे के
रोण्णु रे वा ढ़ोल दगड़ी
सवा सेर नाज कमै के॥६॥

क्या दिनी हमुन व्वीं तें
एक नौं वू भी दास
क्या बिगाडी वेन हमारो
वी द छो हमारो खास॥७॥

बिपदों को समोदर व्वें गो
ढ़ोल का भीतेर ही रे ज्ञायी
न फुटण द्याई व्वे ढ़ोल ते
व्वें कु मान रखी द्याई॥८॥"

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
 © सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक -  १६/०४/२०१२