स्कोलल

गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

What is website hosting

रविवार, 22 अप्रैल 2012

ब्यथा म्यारा देश की…



"ये गढ़देश की ब्यथा कै मे सुनाऊँ
ये गढ़देश की ब्यथा कै मे बिंगाऊँ
क्वै ये ब्यथा सुन ले नि राई
आजाद आज मनै-मन खूब रुवाई
कि गढ़देश की ब्यथा कै मे नि लगाई॥१॥

क्वै साहित्यकारेल सच लेखी यू
कुछ भी झूठ नी लेखन वूँ
“पाणि माँ रे के मगर दगड़ी बैर”
आजाद आज बुण्यू कै मे लगाणी खैर
हमुन द यू पढ़ी वां बे कुछ नी कैर॥२॥

बस यी ब्यथा गढ़देश मा रएं चा
कि गढ़देश मा गढ़देशी बैर कण्या चा
जलण्या च यूँ य दूसरों तें देखि किन
आजाद आज बुण्यू पागल ह्वेगे मेरो मन
ये गढ़देश मे रे के मिन क्या कन॥३॥

यीं कारण आज गढ़देश पिछड्यूँ चा
और यख कु बिकास नी होणु चा
देखा आज देश क्ख पौंछी ग्याई
आजाद सपुगा वास्ता ये लेख्णु राई
कि 'भैजी' प्रीत की सीख ले ल्याई॥४॥"

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
 © सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - १२/०५/२००६ 

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

"परदेशी नि गढ़देशी छों मी"





अपणों कु ठुकरायु
जमाणु कु गुनेगार छों मी
सेरा जागा मा न ही सही
अपना घोर मा खास छों मी॥१॥

रुवे-रुवे के कटदा म्यारा दिन
सुपनियों मा भी रट्ट लगी रेंदि
दूर जै के गढ़देश बिटि
ब्वे-बाबु की आस छों मी॥२॥

माँ कु लाड़-दुलार
फटकार बाबाक सुभै-सुभै
दीदी-भूलियों दगड़ लड़े-झगड़
दादी बिना उदास छों मी॥३॥

जों दगड़ पढ़ी-खेली
गोरू चराया छुट्टियो मा
दगरियोंक समुण सिरांणा रेंदी
बिन उनारा निराश छों मी॥४॥

थोड्या-मेलो की रंगत
क्ख सुणेली घुघुतिक घूर-घूर
कन होली म्यार घोर मा रोनक
ये सोची की हताश छों मी॥५॥

ढ़ोल-दमों कु घम्घ्याट
अर प्वोथिलों की चकच्याट
ज्यू नि लग्दु जब तुमार बिना
गढ़-गीतो का पास रौं मी॥६॥

इनी लिखयु होलु म्यार कपाल मा
की रे मी गढ़देश से दूर
भै-बन्धों माफ करिया मिते
परदेशी नि गढ़देशी छों मी॥७॥


महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
 © सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - १७/०४/२०१२ 


सोमवार, 16 अप्रैल 2012

“बिपदा ढोल्यारों की”


"व्वेन कसी के ढ़ोल
थाप पे थाप लगाई
ताल पे ताल मिले के
ज्यू भौरी के नचाई॥१॥

हेंसदु रे वा
लुके के सारा दर्द
बजाणु रे वा
दिखे के अप्णु फर्ज॥२॥

हमेश यनि बोली व्वेन
बाप-दादा बिटि सेवा करी ठाकुरो
हमुन क्या बोली वे तें कि
तू दास छों हमारों॥३॥

अरे! व्वें कि जिकुडी मा भी
कतक्या पीड़ होन्दी होली
बजे के ताउम्र ढ़ोल
जब नि भोरी वें कि झोली॥४॥

एक कान्धु टांगी के फांचू
दूसरा मा लटके के ढ़ोल
नापि व्वेन गौं-धार-कुड़ा
अर मंगड़ू रे अप्णु मोल॥५॥

डाँका लगी हाथयूं मा
ढ़ोल-दमों बजे के
रोण्णु रे वा ढ़ोल दगड़ी
सवा सेर नाज कमै के॥६॥

क्या दिनी हमुन व्वीं तें
एक नौं वू भी दास
क्या बिगाडी वेन हमारो
वी द छो हमारो खास॥७॥

बिपदों को समोदर व्वें गो
ढ़ोल का भीतेर ही रे ज्ञायी
न फुटण द्याई व्वे ढ़ोल ते
व्वें कु मान रखी द्याई॥८॥"

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
 © सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक -  १६/०४/२०१२

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

"भरोसु कु उमाल"


"मन कु साथ,
भरोसु कु उमाल
अब खत्यै ग्याई


इक टीस त छैई
जिकुड़ी मा,
उ भी फुर्र उड़ी ग्याई


कु ज्याणी क्या ह्वोलु,
आँख्यू का समोदर मा
पनेरा भी समै ग्याई


कै मे बिगाण,
सहारा द्युण वाड़ा
अब दिलासा द्युण ले राई।"
महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
 © सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - ०३/०४/२०१२