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गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

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शनिवार, 21 जनवरी 2012

“दगरियों का गैल”



“मन मा खुशी होन्दी
गैल दगरियों का जब मी रेन्दु
झिकुडी कु बिस्वाष जगेन्दु
गैल दगरियों का जब भी रेन्दु,
             उबाई रे झिकुडी
             निसास लगी, झुरी रे प्राण
             दगरियोंक फाम औणी रे
             इनु दिनोन बॉडी के नि आण,
काखड़ी, संतरा, दाड़िम
अर चोरी स्यो का बग्वान भी
केन द मंदिरों पुज्ये भी खाई
नि छोड़ी भगवान भी,
             सारा सारा दिन घूमी
             रात खुणि निंद नि आई
             भोल जै के क्या होलु
             ये सोची के निंद नि आई,
उठी के सुबेर
दूनी-प्रिथी कु चक्कर
न खे, न पिनि
खेलदा रे दिनभर,
             याद जब दगरियों की आन्दी
             आख्यों मा पाणी ही होन्दु
             ‘आजाद आज भी नि भूली
             हे! तुमु ते क्ने बिसरी जान्दु।”


महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
 © सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - २०/०१/२०१२