स्कोलल

गढ़वाली कवितायें एवं गीत :- महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'

What is website hosting

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

सोची नि कभी ! (गढ़वाली गजल)


"सोची नि कभी कुछ इनि ह्वै जालु
आँख्यू मा आँसू नि तब भी रुवै जालु॥१॥

इक पंछी आली रैबार माँ कु ल्यै के
समूण सिराणा धौरी वु चली जालु॥२॥

जुगराज रै ए पंछी धन तेरो घरबार
घ्वोल छोड़ी कै ए पंछी प्वोथिल उड़ी री जालु॥३॥

खूब रै होलु दुख तेरा गात भी
पंख ल्गै उड़्ग्या ह्वाला जब तेरा मयालु॥४॥

दुख अपणु छोड़ी, दर्द मेरी माँ कु
इन बिँगाई ए पंछी अब समोदर बौगी जालु॥५॥

बिँग्लु क्वै क्या तेरा मन की बात
अपणी खैरी बिपदा मा सब उड़ी जालु॥६॥"

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©सर्वाधिकार सुरक्षित

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

'हे गेल्या मेरी गैल्याणी' ! (गढ़वाली गजल)


"हे गेल्या मेरी गैल्याणी, गेल रे म्यारा सदानी
गेल तेरा रे के तीस बूझी जाँदी म्येरी पराणी॥१॥

त्येरी छूयों माँ बगत बिसरी जांदु
छुवी त्येरी अर तिसेंदी पराणी॥२॥

त्येरु छैल-छबलाट म्येरी झिकुड़ी कु कबलाट
कुमलाई झिकुड़ी त्येरी पर तिसी रे पराणी॥३॥

फड़फड़ान्दु मि यख फड़फड़ान्दी तू तख
कब तीस बुझेली इनु द्वी पराणी॥४॥

दग्डु त्यारू-म्यारु उम्र भर कु
छट न छोड्या कभी न होई बिराणी॥५॥"

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक- ०५/०८/२०१२

रविवार, 5 अगस्त 2012

पैली किले नि बगाई !

"अब देख्याली ना
क्या ह्वै गै
सैरी कुड़ी-बाड़ी
गंगा जी ली गै

जु रखदा हम
गंगा जी तेँ बचै के
त गंगा जी भी
माया लगांदी छणमणे के

कै क क्या, कै कु कन
जनी बूतला त वनी खाला
जु कुछ देखी ब्यायी-परसी
क्या भौऽड़ भी इनी चाला

अपणी गात पर लगायुँ डाम
त ल्वै भी अपणी ही बौगेली
अबी भी बगत छैँ च
नै त यु कोऽढ़ जन सौरेली

अब क्या हैरणु वख
सब अपणी पोटगी च देखणा
ये बिपदा का सोरु ले कै
अपणी जिबड़ी चा चटकाणा

कैँ गौ क्या कसूर
सब्यून भल बिगांई
पर जब ल्वै बगण छैँ च द
पैली किले नि बगाई।"
महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©सर्वाधिकार सुरक्षित
Date- ५/०/२०१२

रविवार, 15 जुलाई 2012

नांगी पिरथी ढ़काणी ! (गढ़वाली गजल)



"चौमासी कुहेड़ी नांगी पिरथी ढ़काणी
धरती की लाज अब नि रै बिराणी॥१॥

द्वी-चार मैना यी कुहेड़ी ढ़काली
आवा अग्वाड़ी अब हमुन भी बचाणी॥२॥

चौमासी कुहेड़ी द्वी-चार मैना ही राली
धै लगावा अब त बारमासी खुज्याणी॥३॥

जाग रे भैजी, दादा-काका अर दीदी
कर उदैँकार अब सैरी दुनिया जगाणी॥४॥

हाथु मा हाथ द्ये, अर खै ल्ये कसम
इत्गया सुन्दर बनाण कि दुनिया दिखाणी॥५॥" 


महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©सर्वाधिकार सुरक्षित
Date- १५/०७/२०१२

'आज भी' ! (गढ़वाली गजल)


"छणंकदी चूड़ी तेरी, मन मा म्यारा आज भी
रुवाँ सी मुखुड़ी तेरी, रुवांदी आज भी॥१॥

तेरी मेरी माया भणाक न लगु लुकोँ मा
वु पैलु समुण सिराणा च आज भी॥२॥

झुरी-झुरी के निरपट सि ह्वेग्योँ
त्येरी ज्गवाड़ मा बैठ्यूं आज भी॥३॥

माया का स्गवाड़ो मा बोड़्यांदु मि
त्येरी माया तें खोज्यादुं आज भी॥४॥

कै ड़ाणडा कै काण्ठयूं मा होली तू
तेरी माया कु तिस्वाड़ु छौँ आज भी॥५॥"



महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©सर्वाधिकार सुरक्षि
Date- १५/०७/२०१२

जौगी-च्यला अर पाणी कु भकार !


 "सुणा भै-बन्दोँ
 अब जौगी भी
 चिमटा छंणके के
 कैलास पौँछी गै
 दगड़ मा रुण्दारु ले के

 जौगी आधु गढ़देश कु राजा
 सब्युं मा रुंण्ण वालु दरबेरी
 सुणी मिन की
 यूँ देबदेश मा
 'पाणी कु भकार' धना छन

 अब कु बतालु कि
 डाम हमु तेँ ना
 इनु ते चैणी
 वु भी कपाली मा

 बल बुना युँ कि
 हम बिकास छ कना
 ना.. ना.. ना..
 यूँ त मालदार दगड़ी
 अफणी फाँची बांधणा

 जब जौगी ही
 माया की बात करलु
 त वु अफी ही खालु ना
 रुवै रुवै कै
 भिक्षा माँगण व्लु भी
 सपु ते रुवालु कि ना

 हे शिव जरा
 योँ कि कपाली मा
 एक चड़चड़ु डाम धरा द
 इनारी अकल मा
 जरा सी खारु लगावा द

 जरा बतावा कि
 डैम ही बिकास नि छ
 अर डैम हमारु काम कु नि छ
 हमु ते बिजली चैणी
 पाणी कु भकार से
 हमुन क्या कन।"

 महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
©
सर्वाधिकार सुरक्षित
Date- १५/०७/२०१२

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

कुहेड़ी !





 १.
"सर्रर सर्रर
कुहेड़ी ऐन

सौण-भादो की
फर्रर फर्रर
बथौन
सब उड़ै गै,

जौँ क
मन मा लगी
बारामासी कुहेड़ी
कु बथौ आलु
उड़ै लिजालु सदैनी।"

 २.
"आ कुहेड़ी
लुकै दे
पिरथी सैरी,
कुनजरीयोँक नजर से
कुछ देर त बची रैली।"

 ३.
"कुहेड़ी
जब चलदी
सैड़्यी रैँद धरती
मन मा
लगी कुहेड़ी
हमेश जिकुड़ी जलांदी
हमेश मनखी तपाँन्दी।"


महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद' 
© सर्वाधिकार सुरक्षित
दिंनाक- १२/०७/२०१२

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

फुलोँ की डाई अर काण्ड़ा !




"फुलोँ की डाई दगड़ भी माया लगै के देख्याँ

काण्ड़ा भी तुमु दगड़ी माया लगाली

फूल द फूल ई छन अर रैला

पर काण्ड़ु भी फूल बणी के दिखाली॥"

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
© सर्वाधिकार सुरक्षित
 

शुक्रवार, 22 जून 2012

क्रिमुलोँ सी धार !


"क्रिमुलोँ सी धार
बगणी छन उन्धार
क्वी बिँग्लु सार
क्वी बतालु बिचार
सुँग-सुँगऽ, सुँग-सुँगऽ
ऐका का पिछ्याड़ी द्वी
द्वीकोँ का पिछ्याड़ी...
अब क्या ब्वन
क्रिमुला भी जान्दा
बौड़ी कै त आन्दा
अपणा पुथलोँ तेँ
दुध-बाड़ी ल्यान्दा
य त क्रिमुलोँ से
परे ह्वै गै
बान्दरोँ सी ठटा ल्गै कै
अपणा काखी पै चिपकै कै
गरुड़ जनी उडै गै
जरा वैँ कु भी त स्वाचौँ
जौन काखी पै चिपकै कै
दूधैक धार गिचा पै लगै कै
अपणा खुच्ली मा सैवायी
जरा स्वाच...
जख तू रलौ
वखी बरकत रैली!"

महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
© सर्वाधिकार सुरक्षित
२३/०६/२०१२

शनिवार, 16 जून 2012

गढ़वाली साहित्य का जान्या-मान्या वरिष्ठ साहित्यकार अर समीक्षक भीष्म कुकरेती दगड़ छ्वीं


गढवळी का युवा कवि श्री महेन्द्र राणा जी क भीष्म कुकरेती क दगड छ्वीं

गढ़वाली कवितायें, महेन्द्र सिंह राणा 'आजाद'


भीष्म कुकरेती - आप साहित्यौ दुनिया मा कनै ऐन?
महेन्द्र राणा – पैलाग गुरुवर जी। जब यु सवाल म्यारा मन मा भी आन्दु त
मिते येकु जबाब ते भौsत दूर जाण पड़दु। मि साहित्य मा कनै ऐन येगा
पिछ्यड़ी माँ भगवती की कृपा छन, सन २००० मा जब माँ भगवती की राज जात
यात्रा हुणि छे त वे बकत म्यारा घौर मा एक चौसिंगया खाड़ू पैदा ह्वे अर
वे बकत मि दर्जा आठ मे पड़दु छौ अर राज जात यात्रा का बारा मा भी नि
ज्यांदू छौं, मिते भौत उत्सुकता छे ये का बारा मा भौत कुछ ज्याणु पर
लुगों का मतभेद ही मिली कोसिस करी की कखी कुछ लिख्यु होलु पर वे बकत कुछ
नि मिली। तबी मिन स्वाच की अगिना जै के मि राज जात यात्रा पर एक किताब
लिखलु, वे बकत मन मा एक ग्येड़ बांधी अर अभी तक वु ग्येड़ खुली नि चा।


भी.कु.- वा क्या मनोविज्ञान छौ कि आप साहित्यौ तरफ ढळकेन?
महेन्द्र राणा – जब मिन स्वाच की मि एक किताब लिख्लु त कनै लिख्लु, मेरी
लिखी किताब लुगौं का पसंद नि आली त मेरु लिख्यु क्या फैदा मिन और कुछ
लिख्ण की तैयारी करी अर जब मि दसवीं मा पड़दु छि त मिन एक कविता लिखी।
धीरे-धीरे मिन और कविता भी लिखी अर आज भी लिख्णु चा।


भी.कु.- आपौ साहित्य मा आणो पैथर आपौ बाळोपनs कथगा हाथ च?
महेन्द्र राणा – मेरी बाळोपन की सोच ही मिते साहित्य की तरफ खिचणी चा।


भी.कु.- बाळपन मा क्या वातवरण छौ जु सै त च आप तै साहित्य मा लै?
महेन्द्र राणा – बाळपन मा मेरी दादी कु लाड़-प्यार अर माँजी, दादी की
सुनाई औखाण-कथा।


भी.कु.- कुछ घटना जु आप तै लगद की य़ी आप तै साहित्य मा लैन !
महेन्द्र राणा – इनी क्वै खास घटना नि घटी पर राज जात यात्रा पर किताब
लिख्णु का बाना ही मेरो साहित्य से नाता जुड़ी।


भी.कु. - क्या दरजा पांच तलकs किताबुं हथ बि च?
महेन्द्र राणा – दरजा पाँच तलक की किताबुं कु त सबसे खास हथ छ, वे बकत की
पढ़ी किताबुन ही मिते आज यख तक पौंछाई।


भी.कु.- दर्जा छै अर दर्जा बारा तलक की शिक्षा, स्कूल, कौलेज का वातावरण
को आपौ साहित्य पर क्या प्रभाव च?
महेन्द्र राणा – दरजा छै अर बारा तलक द मि साहित्य का बारा मा ज्यांदु भी
नि छे पर अपरोक्ष रूप मा आज भी वें बकत शिक्षा मेरा साहित्य मा भौत
प्रभाव डाल्दी।


भी.कु.- ये बगत आपन शिक्षा से भैराक कु कु पत्रिका, समाचार किताब पढीन जु
आपक साहित्य मा काम ऐन?
महेन्द्र राणा – अभी मि साहित्य मे भली के रची-बसी नि अर कभी कभार ही
क्वै पत्रिका, किताब पड़दु। आज इंटरनेट मा ही मि ज़्यादातर साहित्य ते
पढ़दु अर जै की जरूरत पड़दी इन्टरनेट मे ही खोज्यांदु।


भी.कु.- बाळापन से लेकी अर आपकी पैलि रचना छपण तक कौं कौं साहित्यकारुं
रचना आप तै प्रभावित करदी गेन?
महेन्द्र राणा – मेरी पैलि रचना १६ फरबरी २००६ मा छपी, वें बकत तक मिन
सिर्फ बारवीं दरजा तलक का किताबु मा छपी साहित्यकारु की रचना ही पढ़ी चि।


भी.कु.- आपक न्याड़ ध्वार, परिवार, का कुकु लोग छन जौंक आप तै परोक्ष अर
अपरोक्ष रूप मा आप तै साहित्यकार बणान मा हाथ च?
महेन्द्र राणा – मिते साहित्यकार बनाण मा म्यारा दगरियोंक सबसे ज्यादा
भागीदारी छ जूं परोक्ष रूप मा साथ दिन्दा अर परिवार का लोग भी अपरोक्ष
रूप मा साथ दिन्दा, अभी तक त मेरी माँ जी अर पिताजी तें पता भी नि च की
कवितायें भी करदु।


भी.कु.- आप तै साहित्यकार बणान मा शिक्षकों कथगा मिळवाग च?
महेन्द्र राणा – शिक्षकौं कु त भौत मिलवाग च, शिक्षकोन जु भी पढ़ाई दिल
लगै के पढ़ाई।


भी.कु.- ख़ास दगड्यों क्या हाथ च /
महेन्द्र राणा – दगड्यों कु त भौत हथ च, दगड्योन हमेशा ही मेरु हौसला
बढ़ाई अर हर बकत मेरी मदद भी करी।


भी.कु.- कौं साहित्यकारून /सम्पादकु न व्यक्तिगत रूप से आप तै उकसाई की
आप साहित्य मा आओ
महेन्द्र राणा – साहित्य मा आणु तै मिते कैन नि उकसाई अर न ही पैलि क्वै
साहित्यकार /सम्पादक दगड़ी ज्याण-पछयाण रै।


भी.कु.- साहित्य मा आणों परांत कु कु लोग छन जौन आपौ साहित्य तै निखारण मा मदद दे?
महेन्द्र राणा – मिते नि लग्दु कि मि साहित्य मा अभी भली के आई, न ही
क्वै मेरी रचनाओं तें निखारण मे मदद करणा छन। पर आपका मेल अर इंटरनेट
पोस्ट मेरी भौत मदद करदी अर इंटरनेट मा औरी साहित्यकारुक की रचना भी
पढ़ते रोन्दु जूं थोड़ी भौत मेरी रचनाओं मा निखार ल्यान्दी।


धन्यवाद श्री कुकरेती जी आपन अपना कीमती बकत मा म्ये दगड़ छ्वी लगाणु कु मन बनाई।


Copyright@ Bhishma Kukreti

मंगलवार, 12 जून 2012

त्वेन पहाड़ों मा हि रौण


"वखि रौण भुल्ला
उंदारियों मा नि औण
लुकारों की सिख-सौर
कबारी भी नि कौण,

जब चलि जान्दा क्वै छोड़ी के
लौटिक नि आन्दा
जू क्वै आला भी, द्वि दिन
व्वेन ख्न्योर बणि के रौण,

भौत मनै सपु तें
सब अप्णि हि बिप्दौ मा रे
अब पहाड़ो मा हि रै के
अप्णि सोच बढ़ौण,

नि सोचण कि म्यार सभि
बिराँणु मा चलि गेयाँ
अब गढ़देश तेरु च
त्वेन हि खाण सारु नौण,

नि कण लुगौं कि हथ-जुड़ै
य त पहाड़ों कि अकड़ च
अपणा पहाड़ों तें 'आदर्श' बनौण
भुल्ला त्वेन पहाड़ों मा हि रौण।"


(ख्न्योर- मेहमान, नौण- मक्खन)
महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
© सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक – १३/०६/२०१२ 

शनिवार, 26 मई 2012

चखुली जनी माया


"धार-चौबाटा 
सैरा-सौपाटा 
ढ़ैऽपुरी-धुरपाऽड़ा 
गोँ-गोँऽळा-गोरबाटा 
बऽणौँ-बुज्याऽणा 
छानियुँ कोल्यणा
म्येरी चखुली जनी माया 
वीं तेँ खुज्याणी रे
सेरा गौँ
म्यारा नौ कु पिछाड़ी 
बौड़्या लगाणी रे
रात त सदनि आन्द पर 
'आजाद' तेँ जून नि दिखे !"


महेन्द्र सिँह राणा 'आजाद'
© सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनाँक - २३/०५/२०१